( तर्ज - मानले कहना हमारा ० )
खो दिया हमने उमर सब ,
ना सुनी कहि संतकी ॥ टेक ॥
बुजरुगोंने ग्यान लेकर ,
लिख रखा है ग्रंथ में ।
अब याद आती है हमे ,
वह ना सुनी कहि संतकी ॥ १ ॥
बालपन खाली गया ,
और ज्वानिभी बिरथा गयी ।
हूँ पडा बेफाम अब ,
वह ना सुनी कहि संतकी ॥ २ ॥
पाप करने के बखत ,
मीठा लगा दिलजानसे ।
जूतियाँ अब पड रहीं ,
वह ना सुनी कहि संतकी ॥ ३ ॥
कहत तुकड्या जो गये ,
यहही सुनाते चलगये ।
' तुम साधलो , सुख पाओगे '
वह ना सुनी कहि संतकी ।।४ ।।
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